वायुमंडलीय संरचना

वायुमंडल अलग – अलग घनत्व तथा तापमान वाली विभिन्न परतों से बना है. वायुमंडल की परतो को इस प्रकार देखा जा सकता है –

क्षोभमंडल (Troposphere)

वायुमंडल की सबसे निचली परत जिसे संवहन मण्डल, परिवर्तन मण्डल, की संज्ञा दी जाती है, की औसत ऊचाई लगभग 13km है. ध्रुवों के निकट 8km और विषुवत रेखा पर 18km तक ऊचाई प्राप्त होती है. इसका कारण विषुवतीय क्षेत्रों पर अत्यधिक ताप एवं न्यूनदाब तथा ध्रुवों पर न्यूनतम ताप एवं अधिकतम दाब पायी जाती है. वायुमंडल में होने वाली विभिन्न घटनायें जैसे बादल गर्जना, तड़ित झंझा, चक्रवात इत्यादि इसी में घटित होती है. वायुमंडल के समस्त गैसीय द्रव्यमान का लगभग 75% क्षोभमंडल में ही केंद्रित है. क्षोभमंडल में ऊचाई के बढ़ने के साथ प्रति 165 मीटर की ऊचाई पर वायुमंडल का तापमान 1°C की दर से तापमान घटता जाता है. तापमान गिरावट की इसी दर को सामान्य ताप पतन या ह्रास दर (Normal Lapse Rate) कहा जाता है.

क्षोभमंडल की उचाई में मौसमी परिवर्तन होते रहते है. इस मंडल को दो उपमंडलों में विभाजित किया जाता है-

निचला उपमंडल – इस मंडल को घर्षण परत के रूप में भी जाना जाता है. जिसकी ऊचाई 1 -3 कि. मी. तक होती है. धरातलीय सतह द्वारा घर्षण के परिणाम स्वरूप पवनों की गति मंद होती है.

ऊपरी मंडल – यह धरातलीय घर्षण से अधिक प्रभावी नहीं होता यह द्वितीयक वायुमंडलीय संचरण जैसे चक्रवात एवं प्रतिचक्रवात कारको द्वारा प्रभावित होता है.

समताप मंडल

धरातल से 50 कि.मी. की ऊचाई तक समताप मंडल की सीमा है. क्षोभ सीमा समताप मंडल एवं क्षोभ मंडल को पृथक करती है. इसे वायुमंडलीय ढक्कन की संज्ञा दी जाती है. समताप मंडल के निचले भाग में जहा ओजोन की सांद्रता अधिक है, को ओजोन मंडलीय कहा जाता है.यह सूर्य से आने वाली पैराबैंगनी किरणों को अवशोषित करता है.

पैराबैंगनी किरणों के अवशोषण के कारण ही ऊचाई के साथ तापमान में वृद्धि होती है. इसी व्युत्क्रमित ह्रास दर को नकारात्मक ह्रास दर(Negative Lapse Rate) कहा जाता है. कभी -कभी प्रबल संवहनीय धाराएं क्षोभ सीमा को तोड़कर इस मंडल में थोड़ी जलवाष्प ला देती है. यही कारण है कि कभी – कभी यहाँ कुछ विशेष प्रकार के बर्फ से निर्मित बादल दिखाई पड़ते है, जिन्हें सिरस (Mother of Pearls), नैक्रियस क्लाउड कहा जाता है.

मध्यमंडल

मध्यमंडल का विस्तार 50 – 80 कि. मी. की ऊचाई तक समताप मंडल के ठीक ऊचाई पर पाया जाता है. इस मंडल में भी क्षोभ मंडल के समान ऊचाई बढ़ने पर तापमान में कमी होने लगती है. गर्मियों के दिनों में ध्रुवों के ऊपर  संस्तर में निशदीप्त बादलों का विकास होता है. इन बादलों का निर्माण उल्कापिण्ड के धूल कणों एवं संवहन प्रक्रिया द्वारा ऊपर लायी गयी आंद्रता सहयोग से संघनन द्वारा होता है.

आयनमंडल

मध्यमंडल के ऊपर आयन मंडल का विस्तार समुद्र तल से 80 कि. मी. से 400 कि. मी. तक माना जाता है. आयनमंडल में विधुत आवेशित कणों की प्रधानता के कारण आयन मंडल रेडियो तरंगो को पृथ्वी पर परावर्तित करके संचार व्यवस्था को संभव बनाता है. इस मंडल में ऊचाई के साथ कई परतों का विकास हुआ है.

D परत – इसका विस्तार 80-94 km मध्य है यहा पर न्यून आवर्ती तरंगो का परावर्तन करती है परतुं उच्च एवं मध्यम आवर्ती वाली तरंगो को अवशोषित कर लेती है.

E. परत – इसे केनली हैविसाइट परत भी कहा जाता है. इसका विस्तार 99-150 कि. मी. तक है. वह परत मध्यम एवं उच्च आवर्ती वाले रेडियो तरंगो का परावर्तन करती है. D की भांति E भी सौर्यिक विकिरण से संबन्धित है, तथा सूर्यास्त के साथ दोनों परतें विलुप्त हो जाती है.

F परत – इस परत का निर्माण दो उपपरतो से हुआ है, F1 तथा F2 यह परत उच्च आवर्ती वाले तरंगो को पृथ्वी की ओर परावर्तित करती है.

G परत – यह 380 किलोमीटर से ऊपर प्राप्त होती है.

बहिर्मंडल

यह वायुमंडल का सबसे ऊपरी संस्तर है जिसका विस्तार आयनमंडल से ऊपर वाले भाग में है. यहाँ वायु का घनत्व अत्यंत कम हो जाता है. जिसके कारण यहा निहारिका जैसा प्रतीत होता है. यहा तापमान लगभग 5000°C से ऊपर हो जाता है.

सममण्डल –सममण्डल निचले वायुमंडल को प्रदर्शित करता है, इसकी सागर ताल से ऊचाई 90 किलोमीटर तक होती है. इस वायुमंडल को सममण्डल कहने का मुख्य आधार है कि इसमें गैसों का आधार प्रायः एक जैसा होता है. सममंडल तीन भागों में विभाजित है, क्षोभ, समताप एवं मध्यमंडल।

विषममण्डल – इसका विस्तार सममण्डल से 10000 किलोमीटर तक है इस मंडल की विभिन्न परतों के मध्य उनके रासायनिक तथा भौतिक गुणों में अंतर पाया जाता है.  कारण इसे विषम मंडल की संज्ञा दी जाती है.

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